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बुधवार, 18 मार्च 2026

क्रोध

 क्रोध 

क्रोध मनुष्य की स्वाभाविक मानसिक अवस्था है, किंतु जब यह अनियंत्रित हो जाता है तो विवेक का समूल नाश कर देता है। जिस प्रकार अग्नि अंततः उस लकड़ी को जलाकर ही शांत होती है जिसे वह आधार बनाती है, उसी प्रकार क्रोध भी सर्वप्रथम उसी हृदय को दग्ध करता है, जिसमें वह उत्पन्न होता है। आज का आपाधापी भरी जीवनशैली में मनुष्य निरंतर अपनी सहनशीलता और धैर्य खो रहा है, जिसका सीधा और नकारात्मक प्रभाव उसके अंतवैयक्तिक संबंधों और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।


क्रोध प्रायः हमारी अपेक्षाओं के खंड़ित होने या अहंकार को चोट पहुंचने पर उत्पन्न होता हैं। शास्त्रों का उद्घोष है- क्रोधाद्भवति सम्मोहः। अर्थात क्रोध से मूढ़ भाव (अविवेक) उत्पन्न होता है, जिससे बुद्धि भ्रष्ट हो चाती है। जब बुद्धि कार्य करना बंद कर देती है, तब मनुष्य ऐसे आत्मघाती निर्णय लेता है, जिनका पश्चाताप उसे आजीवन खलता रहता है। जिस प्रकार उबलते हुए जल ने अपना प्रतिबिंब देख पाना असंभव है, ठीक उसी प्रकार क्रोधित मन से सत्य और उचित मार्ग का दर्शन संभव नहीं है। भगवान बुद्ध ने इस मनोदशा की सटीक व्याख्या करते हुए कहा था कि क्रोध को पाले रखना, किसी अन्य पर फेंकने की नीयत से जलते हुए कोयले को अपनी हथेली में पकड़े रहने के समान है। इसमें जलते आप स्वयं ही हैं। अतः क्रोध पर विजय प्राप्त करना केवल दूसरों के हित में नहीं, बल्कि स्वयं की शांति और आत्मिक प्रगति के लेए अपरिहार्य है।
क्रोध का वास्तविक समादान उसका दमन नहीं, बल्कि आत्म-जागरूकता और क्षमाशीलता का भाव है। यदि हम क्षणिक उत्तेजना के समय केवल मौन रहने की कला सीख लें, तो हम जीवन की जटिलतम समस्याओं को टाल सकते हैं। संयम और विवेक के साथ किया गया निरंतर प्रयास ही हमारे जीवन को ऊर्जावान, संतुलित और सुखद बना सकता है।

लवली आनंद


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